1. अनिश्चितताओं में कमी : भविष्य अनिश्चितताओं तथा परिवर्तनों से भरा होने के कारण नियोजन अधिक आवश्यक हो जाता है। नियोजन के माध्यम से अनिश्चितताओं को बिल्कुल समाप्त तो नहीं अपितु कम अवश्य किया जा सकता है। पूर्वानुमान जो नियोजन का आधार है, की सहायता से एक प्रबन्धक भविष्य का बहुत कुछ सीमा तक ज्ञान प्राप्त करने तथा भावी परिस्थितियों को अपने अनुसार मोड़ने में समर्थ हो सकता है। तथ्यों के विश्लेषण के आधार पर निकाले गये निष्कर्ष बहुत कुछ सीमा तक एक व्यवसायी को अनिश्चितताओं से निपटने का आधार तैयार कर देते हैं।
भगतसिंह ने लाहौर सेंट्रल जेल में चार सौ से ज्यादा पन्नों की एक डायरी लिखी थी. डायरी में लिखी गई कुछ उर्दू पंक्तियों से भी ऐसे इशारे मिलते हैं. इस डायरी के पेज नंबर 124 में भगत सिंह लिखाते हैं, 'दिल दे तो इस मिजाज का परवरदिगार दे, जो गम की घड़ी को भी खुशी से गुलज़ार कर दे' इसी पन्ने में आगे वो लिखते हैं, 'छेड़ ना फरिश्ते तू जिक्र-ए-गम, क्यों याद दिलाते हो भूला हुआ अफसाना.'
आपने कुछ फिल्में देखी हैं (या स्थिति का अनुभव किया), जैसे कि खुशी का पीछा, पुराने विक्रेता के नियमित रन। बहुत रणनीति नहीं लगती है। पेशेवर को किराए पर लिया जाता है और एक वरिष्ठ से सुनता है "उसका बिक्री लक्ष्य$ 10 मिलियन है। यह तुम्हारा डेस्क है और यह आपका फोन है। शुभकामनाएँ! " उस पल से, विक्रेता फिनिश लाइन के पीछे एक पागल दौड़ में जाता है, जो वह कर सकता है उतना ही बदल सकता है। जब वह लक्ष्य से दूर होता है, तो वह जल्दी उठता है या लंबे समय तक काम करता है।
2. नियन्त्रण में सुगमता : कार्य पूर्व-निर्धारित कार्य-विधि के अनुसार हो रहा हे या नहीं, यह जानना ही नियन्त्रण का कार्य है। नियोजन के माध्यम से कार्य प्रारम्भ करने की विधि तय की जाती है ताकि प्रमाप निर्धारित किये जाते है। ऐसी कई तकनीकों का विकास हो चुका है, जिनसे नियोजन एवं नियन्त्रण में गहरा सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है। जो तकनीक नियोजन में काम में ली जाती हैं वे ही आगे चलकर नियन्त्रण का आधार बनती हैं। इसीलिए यदि नियोजन को नियन्त्रण की आत्मा कह दिया जायेतो कोई गलती नहीं होगी।
10. क्रियाओं के क्रम व समय का निर्धारण- इस चरण में योजना को विस्तृत क्रियाओं में विभाजित करके उनका क्रम व समय निर्धारित किया जाता है, ताकि आवश्यक साधनों, सामग्री व औजारों की ठीक समय पर व्यवस्था की जा सके। क्रम निर्धारित हो जाने से यह पता रहता है कि पहले कौन सी क्रिया प्रारम्भ की जानी है और उसके बाद कौन सी। समय निश्चित कर दे ने से प्रत्येक कार्य का निष्पादन उचित समय पर संभव होता है।
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