10. क्रियाओं के क्रम व समय का निर्धारण- इस चरण में योजना को विस्तृत क्रियाओं में विभाजित करके उनका क्रम व समय निर्धारित किया जाता है, ताकि आवश्यक साधनों, सामग्री व औजारों की ठीक समय पर व्यवस्था की जा सके। क्रम निर्धारित हो जाने से यह पता रहता है कि पहले कौन सी क्रिया प्रारम्भ की जानी है और उसके बाद कौन सी। समय निश्चित कर दे ने से प्रत्येक कार्य का निष्पादन उचित समय पर संभव होता है।
संभावित ग्राहकों की संख्या : यदि आप जानते हैं कि आपके लक्षित बाजार क्षेत्र में 30, 000 वयस्क हैं, और यदि आप एक शिक्षित अनुमान लगा सकते हैं कि उनमें से दस में से एक या 10 प्रतिशत - सेवाओं का एक उपभोक्ता है तुम्हारी तरह, आप मान सकते हैं कि आपके व्यवसाय में 3, 000 वयस्कों का कुल संभावित बाजार है। यदि आप 300 वयस्कों की सेवा करते हैं, तो आपके पास अपने लक्षित बाजार का 10 प्रतिशत हिस्सा है।
जब रियल एस्टेट लेनदेन में ऋण शामिल होते हैं, बैंकों और सरकारी प्रायोजित उद्यमों (जीएसई) को पहले से ही संदेहास्पद समझे जाने वाले किसी भी गतिविधि की रिपोर्ट करना आवश्यक है लेकिन नकली भुगतान करने वाले अनोखा खरीदारों ऐतिहासिक रूप से रडार के नीचे उड़ रहे हैं नतीजतन, यह अभ्यास दुनिया भर के लोगों और संगठनों के लिए अपने गंदे पैसे को साफ करने के लिए एक लोकप्रिय तरीका बन गया है।
एक बार जब यह लक्ष्यीकरण विकल्प सभी सेमाल्ट पेज मालिकों के लिए उपलब्ध हो जाता है, तो अब वे विशिष्ट प्रकार के प्रशंसकों को लक्षित संदेश भेज सकते हैं। यह विकल्प उन्हें उन अनुयायियों को व्यक्तिगत प्रोत्साहन प्रदान करने देगा जो एकल या रिश्ते में हैं। वे उनके प्रशंसकों के लिए प्रासंगिक समाचार भेज सकते हैं जो उनके स्थान के पास एक स्थानीय विश्वविद्यालय में भाग लेते थे।

ये शेर शहीद भगत सिंह का है. जिन्हें हम शहीद-ए-आज़म के नाम से जानते हैं. यूं तो 23 मार्च की तारीख़ सभी को याद रहती. उस ख़ास दिन भगत सिंह ने फांसी के फंदे को चूमा था. पर 28 सितंबर की तारीख़ कम ही लोगों को याद रहती है. साल 1907 में इसी दिन भगत सिंह का जन्म हुआ था. हम बात करेंगे भगत सिंह की ज़िंदगी के उस पहलू पर, जो हमेशा से ही लोगों के बीच कौतूहल का विषय रहा है. भगत सिंह क्या थे? उनकी आस्था क्या थी? नास्तिक? आस्तिक? सिख? हिंदू? या फिर एक आर्यसमाजी?


ईश्वर में विश्वास रखने वाला हिन्दू पुनर्जन्म पर राजा होने की आशा कर सकता है. एक मुसलमान या ईसाई स्वर्ग में व्याप्त समृद्धि के आनन्द की और अपने कष्टों और बलिदान के लिये पुरस्कार की कल्पना कर सकता है. किन्तु मैं क्या आशा करूँ? मैं जानता हूँ कि जिस क्षण रस्सी का फ़न्दा मेरी गर्दन पर लगेगा और मेरे पैरों के नीचे से तख़्ता हटेगा, वह पूर्ण विराम होगा– वह अन्तिम क्षण होगा. मैं या मेरी आत्मा सब वहीं समाप्त हो जायेगी. आगे कुछ न रहेगा. एक छोटी सी जूझती हुई ज़िन्दगी, जिसकी कोई ऐसी गौरवशाली परिणति नहीं है, अपने में स्वयं एक पुरस्कार होगी– यदि मुझमें इस दृष्टि से देखने का साहस हो.
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